मदद के नाम पर मजाक, मानवता भी शर्मसार

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प्रतीकात्मक छवि : साभार इंटरनेट
  • प्रकृति से लेकर संस्कार तक को झकझोरती बेबस बचपन की त्रासदी जो सुर्खियां न बन सकीं, पितृमेध से वंचित अभागे मासूमों से गंगा में फेंकवा दिया पिता का शव

इसे बेबस बचपन की त्रासदी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं। बिन मां के बच्चे मार्ग दुर्घटना में घायल मजदूर पिता को खोकर अनाथ हो गए। फिर मदद के नाम पर गरीबी का ऐसा मजाक बना कि मानवता भी शर्मसार हो गई।

वाराणसी के चित्रसेनपुर निवासी तीन वनवासी बच्चों के साथ शुक्रवार को जो हुआ उसे संवेदना के साथ महसूस करेंगे तो प्रकृति से लेकर संस्कार तक हाहाकार सुनाई देगा। पितृमेध से वंचित अभागे मासूमों का दर्द आपकी आंखें तर कर देगा।

सोचिए, क्या दृश्य रहा होगा… मददगारों के सहारे गरीबी के मारे ये बेचारे पिता की चिता सजाने के लिए चीत्कारे होंगे। उन पर क्या गुजरी होगी जब दाह संस्कार की व्यवस्था न होने पर उन्हें पिता का शव गंगा मैया के हवाले करना पड़ा होगा।

अब उनके सामने खाने के लाले हैं। संवेदनहीन व्यवस्था के बीच ये अनाथ प्रारब्ध के हवाले हैं। 9 फरवरी को पिता के चोटिल होने के साथ बहने शुरू हुए इनके आंसू अब सूख चुके हैं। मृतक झांसी वनवासी के बच्चे साहब (11), मुनीब (10) और रेखा (17) को अब दाल रोटी की चिंता है। दोना व पत्तल बेचकर राशन भी लाना है।

  • एनजीटी के आदेशों का उल्लंघन हुआ

मदद के लिए चंदा जुटाने वाले पोस्टमार्टम के बाद ही पीछे हट गए। यह जानते हुए भी कि गंगा में शव फेंकना अपराध है फिर भी बच्चों को ऐसा करने की राय इन मददगारों ने ही दी। जाने अनजाने में इन लोगों ने गंगा मैया के दामन को प्रदूषित करने का अपराध किया है। यह साफ-साफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेशों के उल्लंघन का मामला है।

  • यह था मामला

कछवां रोड चौराहे के पास चित्रसेनपुर गांव के सामने गत नौ फरवरी की रात पैदल हाइवे पार करने के दौरान बोलेरो की चपेट में आने से झांसी घायल हो गए। एंबुलेंस ने मंडलीय अस्पताल पहुंचाया, जहां मौत हो गई। अस्पताल से मेमो न जाने के कारण गरीब का शव पड़ा रहा। गुरुवार को शव बीएचयू भेजा गया, लेकिन शुक्रवार को पोस्टमार्टम हो पाया। निवर्तमान प्रधान समेत अन्य ने दाह संस्कार के लिए चंदा जुटाया, मगर दो दिन की भाग-दौड़ में आधा रुपया खर्च होने की बात कहकर दाह संस्कार की जगह जल प्रवाह का विकल्प सुझा दिया।

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