मनवांछित वर देंगे त्रिपुरारी

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साकार कहो या निराकार,
चाहे कह लो ओमकार।
वह आदि-अनादि, सनातन हैं,
जीवन मोक्ष का साधन हैं।
वह काशी हैं कैलाशी हैं,
वह घट-घट के वासी हैं।
शिव सोमनाथ, शिव मंगल हैं,
जटा-जूट वट जंगल हैं।
हैं शक्ति रूप अर्धनारीश्वर,
वह आदि योगी हैं योगीश्वर।
वह परमात्मा, वह पालक हैं,
वह परमब्रह्म संहारक हैं।
चिता भस्म भाए उनको,
वह भोले हैं, वह फक्कड़ हैं।
हैं कालों के वह महाकाल,
पर वो ही सृष्टि की जड़ हैं।
वह शाश्वत हैं, वह ही सत हैं,
संन्यासी हैं, गृहस्थ रत हैं।

है उनकी बेहद अनुपम छवि,
भाल चंद्र, मुखमंडल रवि।
व्याघ्र चर्म उनका वासन,
कामरूप वृष है वाहन।
कर में त्रिशूल-खप्पर-डमरू,
हो प्राण वायु केशों से शुरू।
वह आशुतोष क्षण में खुश हों,
रूद्र बनें क्रोधित जब हों।
पैरों में कड़ा उन्हें प्रिय है,
जटा में गंगा अतिप्रिय है।
है नीलकंठ पर लिपटा नाग,
रूद्राक्ष बताता है वैराग।
गौरीशंकर का दिन है विशेष,
पूजा का फल मिलेगा अशेष।
भांग, धतूरा और बेलपत्र,
मिल जाएंगे यत्र-तत्र।
मंदार पुष्प और चंदन हो,
न हो तो हृदय से वंदन हो।
खुश होंगे भोले-भंडारी,
मनवांछित वर देंगे त्रिपुरारी।

  • वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष मिश्र का भक्तिभाव

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