अपने हिस्से की मैं पी चुका…(शराबी पत्रकार का इकरारनामा)

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बहुत हुआ अब और नहीं…। यदि मैंने शराब पीना नहीं सीखा होता तो आज निश्चित रूप से समाज में एक बहुत ही प्रतिष्ठित व्यक्ति होता. शराब का एडिक्ट बनने के पीछे सिर्फ और सिर्फ मेरी मनबढ़ई जिम्मेदार है. मौज-मस्ती के लिए सामान्य बुद्धि खोकर मैंने इसे अपनाया. कई बार छोड़ने के बाद पकड़ा. मेरे सामने तनाव का कोई ऐसा क्षण नहीं आया जब शराब पीना जरूरी रहा हो.

हालांकि शुरू में मैं शराब से बचाव के प्रति बेहद संजीदा था था और इसे बुरा समझता था. लोग मेरे सामने पीते थे और मुझे भी कहते थे, लेकिन मेरा इससे कोई वास्ता नहीं रहता. तो यही वजह है कि अपेक्षाकृत मैंने ज्यादा उम्र से शराब पीनी शुरू की, लेकिन जब एक बार की तो आदी ही हो गया. यह मेरे लिए खतरनाक साबित हुआ. दिल्ली में रहने के दौरान अपेक्षाकृत अधिक वेतन मिलना, बचत न करने की प्रवृत्ति जिसमें गैरजिम्मेदाराना व्यवहार खुद शामिल है और वहां किसी प्रकार की रोक का न होना, मुझे शराब का आदी आदी बना दिया. निश्चित तौर पर मैं कहूंगा इसमें संगति का भी दोष है. शुरुआत भी तो आखिर संगति की वजह से ही हुई. यह शुरुआत बाद में संगति की वजह से ही लत के रूप में बदल गई. लेकिन जो हुआ सो हुआ. अपने हिस्से की मैं पी चुका. बीता हुआ समय तो वापस आ नहीं सकता. अब पछताने से क्या फायदा. आगे की सुधि ली जाए.

मेरे पास अभी समय है. मैं अब से सुधर जाऊं तो उम्मीद है कि कुछ विशेष कर सकता हूं. लेकिन मेरे पास अब थोड़ा भी समय इस बात के लिए नहीं है कि मैं उसे शराब जैसे व्यसन मैं व्यर्थ जाया करूँ. अब मेरे पास जरा भी समय इसके लिए भी नहीं है कि मैं उसे “मौज-मस्ती” में बिताऊं. बहुत बिता चुका अब और नहीं. पहले ही ज्यादा तो नहीं लेकिन कुछ कम भी नहीं, देर हो चुकी है. अब न संभलने का मतलब यह जीवन व्यर्थ में गंवा देना. यही सब सोचकर मैं यहाँ आया.

एक बात और है कि आखिर एक दिन हर शराबी को शराब छोड़नी ही पड़ती है. चाहे वह लिवर फेलियर के चलते बिस्तर पर पड़कर कराहते हुए या फिर एक्सीडेंट में हाथ-पैर तोड़कर घिसटते हुए. तो क्यों न इन सब खराब स्थितियों से बचते हुए अभी से इसे गुडबॉय कह दिया जाए.

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