शख्सियत : हरिशंकर तिवारी- अपराध की यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर या यूपी में छोटे दलों की सियासत के ‘चाणक्य’

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  • आज है इस बाहुबली नेता का जन्मदिन, सक्रिय राजनीति से हैं दूर, मगर अब भी रखते हैं पूरे पूर्वांचल में बड़ा उलटफेर करने का माद्दा

लखनऊ : सूबे की सियासत में अचानक बढ़े ब्राह्मण मोह और छोटी पार्टियों से गठजोड़ की होड़ के बीच पूर्व कबीना मंत्री हरिशंकर तिवारी का जिक्र प्रासंगिक हो जाता है। विरोधी अपराध की यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर कहकर घेरते रहे, पर किसी की भी सरकार रही वो छोटे दलों की सियासत को साध हमेशा मंत्री बनते रहे। आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर हमेशा निशाना साधा गया, पर एक माननीय के रूप में उन्होंने अटल जी और राजीव गांधी जैसे नेताओं के साथ मंच साझा किया। आज इस बाहुबली नेता का जन्मदिन है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि हरिशंकर तिवारी भले ही सक्रिय राजनीति से हैं दूर, मगर अब भी पूरे पूर्वांचल में बड़ा सियासी उलटफेर करने का माद्दा रखते हैं। हम यह आप पर छोड़ते हैं कि आप उन्हें अपराध की यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर कहते हैं या यूपी में छोटे दलों की राजनीति का ‘चाणक्य’ मानते हैं।

हरिशंकर तिवारी

इन दिनों सपा, बसपा या आप जैसे दलों में ब्राह्मणों की पैरोकारी की जो होड़ लगी हुई है, उस सूरत में भी हरिशंकर तिवारी की चर्चा मौजूं है। पूरे पूर्वांचल ही नहीं प्रदेश भर के ब्राह्मणों के बीच हरिशंकर तिवारी की पैठ है। बुजुर्गों के लिए ‘पंडित जी’ युवा और अधेड़ उम्र के ब्राह्मणों के बीच ‘बाबूजी’ के नाम से जाने जाते हैं। उनकी एक खुद की राजनीतिक पार्टी भी है लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी। तिवारी जी के राजनीतिक संन्यास लेने के बाद से पार्टी भी पूरी तरह से सुप्त अवस्था में है। तिवारी जी की राजनीतिक विरासत संभाल रहे बड़े पुत्र पूर्व सांसद भीष्म शंकर तिवारी और छोटे पुत्र चिल्लूपार के विधायक विनय शंकर तिवारी ने अब तक पिता के दल पर कोई बल नहीं लगाया। 85 वर्ष की उम्र पूरी कर चुके हरिशंकर तिवारी हाल ही में कोरोना संक्रमण के खिलाफ भी बाहुबली बनकर चर्चा में आए थे। बीमारी को मात देकर वो 5 अगस्त, 2021 को अपना 85वां जन्मदिन मनाया।

जेल से ही जीते थे चुनाव

यूपी की राजनीति में हरिशंकर तिवारी उस वक्त चर्चा में आए जब 1985 में जेल में रहकर गोरखपुर की चिल्लूपार सीट से विधानसभा चुनाव जीत गए। इसके बाद हरिशंकर तिवारी के लिए राजनीति का दरवाजा खुल गया। साल 1997 से लेकर 2007 तक वे लगातार यूपी में मंत्री बने रहे। वह 22 सालों तक चिल्लूपार सीट से विधायक रहे। तिवारी को केवल 2 बार हार मिली। वह पहली बार साल 2007 में और दूसरी बार साल 2012 में चुनाव हारे। भाजपा, सपा, बसपा सभी सरकारों में वे कई मंत्रालयों को संभालते रहे।

“राष्ट्रहित में ही ब्राह्मणहित है, ब्राह्मणहित में ही राष्ट्रहित है“
– पं . हरिशंकर तिवारी
सरकार द्वारा उत्पीड़न के कारण राजनीति में आए

हरिशंकर तिवारी के मुताबिक वे राजनीति में इसलिए आए, क्योंकि उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने उन पर झूठे केस लगाकर जेल भेज दिया। हरिशंकर तिवारी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह पहले प्रदेश कांग्रेस के सदस्य थे। इंदिरा गांधी के साथ काम कर चुके हैं, लेकिन चुनाव कभी नहीं लड़ा। तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा किए गए उत्पीड़न के कारण उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया।

आरोप तमाम, पर आज तक एक भी साबित नहीं

1980 के दशक में हरिशंकर तिवारी के खिलाफ गोरखपुर जिले में 26 मामले दर्ज किए गए, लेकिन आज तक वह किसी भी आरोप में दोषी नहीं पाए गए। उनके बारे में कहा जाता है कि वे खुद जुर्म नहीं करते थे।

राजीव गांधी के साथ हरिशंकर तिवारी
प्यार या नफरत कर सकते हैं, मगर नजरअंदाज नहीं

इतने आरोप उसके बावजूद चिल्लूपार की जनता हरिशंकर तिवारी को बार-बार जिताती रही और विधानसभा भेजती रही। छोटे दलों की सियासत का चाणक्य बनकर 1997 से 2007 तक हरिशंकर तिवारी लगातार प्रदेश में मंत्री बनते रहे। सीधे तौर पर पंडित हरिशंकर तिवारी का दामन कभी दागदार नहीं हुआ। पूर्वांचल के ब्राह्मण बिरादरी में उनका बेहद सम्मान है। हरिशंकर तिवारी के लिए कहा जाता है कि यूपी और पूर्वांचल की राजनीति में अगर आपको दिलचस्पी है, तो आप हरिशंकर तिवारी से प्यार या नफरत कर सकते हैं। उन्हें अपराधी या रॉबिनहुड मान सकते हैं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हरिशंकर तिवारी फिलहाल अपने गोरखपुर के जटाशंकर मुहल्ले में किलेनुमे घर में रहते हैं। इस घर को तिवारी हाता के नाम से पूरे गोरखपुर व पूर्वांचल में जाना जाता है।

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