राजपथ पर सपा का रथ मांगे ब्राह्मण सारथी!

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  • यूपी विधानसभा चुनाव के लिये इसबार केंद्र में हैं ब्राह्मण, सपा की कोशिशें तेज हुईं
  • जनेश्वर मिश्र का नाम और ब्राह्मण नेताओं का चेहरा सामने किया, भरोसा-रीझेंगे फाॅरवर्ड वोटर्स

अभयानंद कृष्ण, लखनऊ

साल 2003-04 की बात होगी, एक अंग्रेजी अखबार ने एंकर स्टोरी छापी थी- ‘नाउ सपा हैज बिकम पार्टी आॅफ थ्री ए-अंबानी, अमिताभ एंड अमर..!’ सियासत बेचैन सी पहलू बदलती है। आज सपा के पहलू से ये तीनों चेहरे गायब हैं। दुनियावी वजूद से गायब तो अमर सिंह और छोटे लोहिया कहे जाने वाले वह जनेश्वर मिश्र भी हो चुके हैं, जिन्होंने अखबार की इस हेडलाइन से जुड़े सवाल पर तब कहा था कि जबतक उनसे सवाल किए जाने की ताब लोगों में बची रहेगी, वह अप्रासंगिक नहीं हो सकते। 17-18 साल बाद जब यूपी में विधानसभा चुनाव का काउंट डाउन शुरू है, जनेश्वर मिश्र का नाम सपा की विरासत बन कर ब्राह्मण मतों को रिझाने के काम आने लगा है। राजधानी सहित प्रदेश भर में सपा ने सरकार के खिलाफ अपनी साइकिल रैली गए रोज जनेश्वर मिश्र की जयंती के अवसर पर ही किया। इसी दिन सपा की बौद्धिक इकाई की बैठक हुई जिसमें प्रायः ब्राह्मण चेहरे हैं। और तो और ब्राह्मणों के गढ़ कहे जाने वाले कन्नौज में पूर्व सीएम अखिलेश यादव की पत्नी और पूर्व सांसद डिंपल ने यहां तक कह दिया कि विकास को ठोंकने वाली सरकार को ठोक देने का समय आ गया है। जाने विकास, तरक्की को बोलीं या फिर उस विकास को कि जिसके एनकाउंटर के बाद ब्राह्मणों में रोष और सत्ता से दूर बैठे सियासी दलों में ब्राह्मणों के प्रति प्यार उमड़ आया था।

  मतों को जातीय आधार पर देखें तो उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतों की संख्या 10 से 12 फीसद है। यह अव्वल न तो कोई ऐसी संख्या है जिसके बूते सरकार खड़ी की जा सके, न ही ब्राह्मण एक साथ अब तक कियी सियासी दल को समर्थन किये हैं। पर, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद कथित ठाकुरवाद से निराश और नाराज बाह्मण विकल्पों की तलाश तभी से शुरू हो चुकी है। कानपुर के बिकरू कांड के बाद यह नाराजगी इस कदर मुखर भी हो गई कि उसके बाद हुए विधानसभा के उपचुनावों में जहां मुमकिन था सभी राजनैतिक दलों ने बाह्मण उम्मीदवारों को तरजीह दिया। पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया सदर विधानसभा क्षेत्र के लिए तो सभी उम्मीदवार ब्राह्मण हुये। यह और बात है कि भाजपा का ब्राह्मण वहां विधायक बना। सियासत के सयानों का मानना है कि बाह्मण मतदाता एक तो अपने साथ दूसरे वर्ग के वोट भी सहेज पाने में सक्षम होता है, दूसरे सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रति यहां कायस्थ और बनिया वर्ग में भी नाराजगी है। इस नाराजगी को बाह्मण दिशा देने में सर्वाधिक सक्षम है। इसलिये सपा मुखिया अखिलेश यादव ने विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय, अभिषेक मिश्र, सनातन पांडेय, संतोष पांडेय और पवन पांडेय जैसे चेहरों को आगे किया है।

ये चेहरे फिलहाल बागी बलिया को चुने हैं जहां 15 अगस्त को इस दिशा में अपना कारवां बढ़ायेंगे। सपा के इस कदम पर बसपा सुपीमो मायावती के प्रतिक्रियात्मक ट्वीट को शुरूआती कामयाबी भी माना जा रहा है। सपा को फिलहाल यह संदेश ही सार्वजनिक कर देना है कि वह ब्राह्मणों की सच्ची हितैषी है। सीनियर जर्नलिस्ट अशोक कुमार कहते हैं कि बाह्मणों में नाराजगी है और लगभग सभी राजनैतिक दल इसे भुनाने की जुगत में हैं। लेकिन, समाजवादी पार्टी के लिए अच्छा यह है कि वह सड़क पर उतर कर विरोध करने का तरीका बेहतर जानती है। परशुराम की मूर्ति बनाने का बयान और फिर उस मुद्दे पर खामोशी सपा की सियासी समझदारी ही है। उसे इसका लाभ मिलेगा। दूसरी बात यह कि आम आदमी के भीतर सत्ता के खिलाफ जो स्वाभाविक प्रतिरोध होता है उसे सपा अपने पक्ष में आसानी से कर सकती है। कयास और अंदाजों के बीच फिलवक्त चुनाव में अभी वक्त है और सियासत बेचैन सी पहलू बदलती है।       

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