(बात बीते कल की) बाबा ने मेरे लिए यह घड़ी…

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बाबा ने मेरे लिए यह घड़ी खरीद दी थी लगभग साढ़े तीन दशक पहले. भला तब घड़ी की क्या जरूरत थी! अब मेरे ही पुत्र के उठने का कोई टाइम नहीं है. लेकिन तब एक सुबह उठकर मैं सीढ़ियों पर बैठे ऊंघ रहा था कि पीटीआई योगेन्द्र सिंह किसी काम से आ गए. कुछ खुढ़ुर-बुढ़ुर पर तन्द्रा टूटी तो बहुत कोफ्त हुई. भिन्सारे जागने वाला कभी नहीं रहा लेकिन शरीर पर घाम लगे उस समय तक सोना बुरा माना जाता था. तब सहजनवां क्या खूब कस्बा हुआ करता था. चौराहे पर जाने की तो इजाज़त नहीं थी* और न ही कभी चेष्टा की लेकिन सुन्दर से कॉलेज की फील्ड में गुलमोहर और अमलतास के सुन्दर पेड़ थे. अंदर जीव विज्ञान विभाग के पास तमाम सुन्दर फूल. गेंदा के बड़े फूलों से मैं और रामप्रकाश सिंह बैडमिंटन (हथेली वाला) खेलते थे.
(*एक बार बैजनाथ चाचा नाराज हुए तो कोई रात का पहरेदार लेकर खाना खिलाने जाता था. वह कथा मार्मिक है और फिर कभी.) – वरिष्ठ पत्रकार वेद रत्न शुक्ल की फेसबुक वॉल से साभार

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